धर्म को लेकर क्या थे कार्ल मार्क्स के विचार?

कार्ल हेनरिक मार्क्स का जन्म 5 मई 1818 को जर्मनी के प्रुसिया में हुआ था। वे जर्मन दार्शनिक, राजनीतिक अर्थव्यवस्था के आलोचक, अर्थशास्त्री, इतिहासकार, समाजशास्त्री, राजनीतिक सिद्धांतकार, पत्रकार और समाजवादी क्रांतिकारी थे। कार्ल धर्म को एक बहुत खतरनाक नशा मानते थे। वह कहते थे। इंसान धर्म को बनाता है, धर्म इंसान को नहीं। दरअसल, धर्म इंसान की आत्म-व्याकुलता और आत्म-अनुभूति है, जिसने या तो अभी तक खुद को नहीं पाया है या फिर पा कर खुद को पुनः खो दिया है। लेकिन इंसान कोई अमूर्त वस्तु नहीं है, जो दुनिया के बाहर कहीं बैठा है। इंसान इंसानों, राज्य, समाज की दुनिया है। यह राज्य, यह समाज धर्म पैदा करता है, एक विकृत विश्व चेतना पैदा करता है, क्यों कि वे एक विकृत दुनिया हैं। धर्म इस दुनिया का समान्यीकृत सिद्धांत है, इसका विश्वकोशीय सारांश है, लोकप्रिय रूप में इसका तर्क है- 
धर्म दमित प्राणी की आह है, एक बेरहम दुनिया का एहसास है, वैसे ही, जैसे यह गैर - आध्यात्मिक स्थितियों की प्रेरणा है। धर्म एक नशा है "यह लोगों की अफीम है।" 

लोग धर्म के द्वारा उत्पन्न झूठी खुशी से छुटकारा पाए बिना सच्ची खुशी हासिल नहीं कर सकते। यह मांग की लोगों को इस भ्रम से मुक्त हो जाना चाहिए, उसका मतलब यह माँग है कि ऐसी स्थिति को त्याग देना चाहिए, जिसमें भ्रम की जरूरत होती है। 

आलोचना का हथियार हथियार की तरह आलोचना की जगह नहीं ले सकता। भौतिक ताकत को भौतिक ताकत से ही जीता जा सकता है, लेकिन सिद्धांत भी जैसे ही लोगों को अपने कब्ज़े में लेता हैं, भौतिक ताकत बन जाता है। 

भगत सिंह के जीवन में कार्ल मार्क्स का बहुत प्रभाव था। धर्म को लेकर भगत सिंह के भी यही विचार थे जो कि उन्होंने अपनी डायरी में लिखे थे। भगत सिंह की डायरी बाजार मे "भगत सिंह जैल डायरी" के नाम से आसानी से उपलब्ध हो जाती है। 


स्रोत - 
भगत सिंह जैल डायरी - P. no. - 40

- पंकज (नीलोफ़र) 





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