कहीं आप भी स्वामी राम की भाँति अज्ञानी तो नहीं!


स्वामी राम अभी अभी सन्यासी हुए थे और कुछ उपनिषदों का अध्ययन कर नए आने वाले सन्यास साधकों को उपनिषदों की शिक्षा दिया करते थे। एक दिन स्वामी जी को आभास हुआ कि उन्हें अपने ज्ञान का अहंकार हो गया है। वे स्वयं को ज्ञानी एवं सर्वश्रेष्ठ समझने लगे हैं। उन्हें लगने लगा कि बौद्धिक स्तर पर उनसे बड़ा कोई विद्वान नहीं है। इसीसे परेशान हो कर वे अपने गुरु जी के पास गये और उन्हें अपने अहंकारी होने का भाव बताया। 
पहले तो गुरू जी ने हँसते हुये कहा कि तुम मदमस्त हो गए हो। परन्तु कुछ देर बाद बोले अभी तुम उस बच्चें की भाँति हो जो विद्यालय तो जाता है किन्तु अभ्यास नहीं करता । तुम्हें चार वस्तुओं पर अधिकार प्राप्त करना है परमात्मा को जानने और उनसे मिलने की इच्छा रखो किन्तु स्वार्थी न बनो। क्रोध, लोभ एवं आसक्ति को त्याग दो और ध्यान करने का अभ्यास करो। इन चारो पर स्वामित्व प्राप्त कर लेने के बाद ही तुम कुछ प्राप्त कर सकते हो। इन चारो का समग्र अभ्यास करने के बाद तुम पूर्णत्व पा सकोगे।
इसके बाद गुरुदेव ने स्वामी जी को कुछ सन्तों की सूची देते हुए उनसे मिलने को कहा। उन्होंने कहा संतों के साथ नम्रता से रहना। दुराग्रही और प्रतिशोधी बनकर तुम उनसे कुछ प्राप्त नहीं कर सकते। वे आँखे बंद कर के ध्यान में बैठ जाएंगे और कुछ नहीं बतायेंगे। क्योंकि गुरू जी जानते थे कि स्वामी जी कितने दुराग्रही और धैर्यहीन थे।
गुरू जी की प्रेरणा से स्वामी जी इन संतों से मिलने निकले। सबसे पहले वह एक संत से मिलने पहुंचे वे बिलकुल निसंग और आसक्त थे, सांसारिक आकर्षण उनके लिए निष्क्रिय थे। उनके आसपास जो भी हो वो कोई ध्यान नहीं देते। किसी से बात भी नहीं करते किसी की ओर देखते तक नहीं थे और भोजन भी नहीं करते थे। शास्त्रों में इसी अवस्था को अजगरवृत्ति कहते हैं। जैसे अजगर कई दिनों तक एक ही स्थान पर पड़ा रहता है वेसे ही संतजन भी एक ही जगह पर स्थिर रह कर ध्यान में मग्न रहते हैं।
जब स्वामी राम उनसे मिलने पहुंचे तब वे संत एक पहाड़ी पर लेटे ध्यान में मग्न थे। स्वामी जी उनके पास पहुंचे और उनका चरण स्पर्श किया। वे संत ध्यान में थे वे कुछ ना बोले। स्वामी राम ने तीन - चार बार उनसे पूछा कि स्वामी जी आप कैसे है। किंतु वे कुछ भी नहीं बोले। तब स्वामी राम उनके पैर दबाने लगे। स्वामी राम ने सोचा कि ऐसा करने से वे कुछ प्रसन्न होंगे। किंतु उन्होंने स्वामी राम को एक लात मारी उनकी लात का प्रहार इतना शक्तिशाली  था कि स्वामी जी उस सीधी पहाड़ी से लुढकते हुए नीचे झरने के पास आ गिरे। स्वामी के गुस्से का ठिकाना नहीं रहा उनके मन में प्रतिशोध की ज्वाला धधक उठी। उन्होंने सोचा कि मैं इसकी सेवा कर रहा था और इसने मुझे इतनी जोर की लात मारी। यह संत नहीं हो सकता और शायद मेरे गुरू जी ने मुझे इस पाखंडी को सबक सिखाने के लिए ही यहाँ भेजा हैं। अब मैं इस पाखंडी के दोनों पैर तोड़ दूँगा। ऐसा सोचते हुए स्वामी राम पहाड़ी पर चढ़ने लगे। ऊपर पहुंचकर देखा कि वे संत स्वामी राम को देख कर मुस्कुरा रहे हैं। स्वामी राम अत्याधिक क्रोधित हो गए और प्रतिशोध की भावना से उबलने लगे। मगर स्वामी जी जैसे ही संत के नजदीक पहुँचे वे मुस्कुराते हुए बोले 'और बेटा कैसे हो' । स्वामी राम क्रोध से जलते हुए बोले कैसा हूँ पहले मुझे लात मार कर नीचे फेंक दिया और अब पूछते हो मैं कैसा हूँ।
वे बोले तुम्हारें गुरूदेव ने तुम्हें चार चीजों पर अधिकार पाने को कहा था। मैंने तुम्हारे क्रोध की परीक्षा लेने के लिए तुम्हें लात मारी थी। और तुम इस समय इतने क्रोध में हो की मुझसे कुछ नहीं सीख सकते, तुम्हारा मन शांत नहीं हैं। तुम्हारे गुरूदेव महान है, तुम उनकी शिक्षा का अनुसरण नहीं कर सकते तो तुम मुझसे क्या सीख सकते हो चले जाओ यहां से।
स्वामी राम रोते हुए सोचने लगे कि अभी कुछ दिन पहले तो मुझे लगता था कि मैं एक उच्चकोटि का स्वामी हूँ मुझे शास्त्रों का ज्ञान है। किंतु यह तो एक दम उल्टा हो गया। मैं तो अज्ञानी हूँ। तब स्वामी जी ने उन संत से कहा कि प्रभु मैं अपने अहंकार पर विजय प्राप्त कर वापस आऊंगा और वहाँ से चले जाते हैं।
अब वे दूसरे संत के पास जाते हैं और सोचते हैं कि अब चाहे जो हो जाए वे गुस्सा नहीं करेंगे। इन संत का बहुत बड़ा आश्रम था खेती करने योग्य बहुत सारी जमीन भी थी। बात चीत में उन्होने कहा कि मैं यह पूरा आश्रम और जमीन तुम्हें दे दूँगा क्या तुम यह सम्भालना चाहते हो। स्वामी राम ने तुरंत हाँ कर दी। इस पर वे संत मुस्कुराते हुए बोले कि तुम्हारे गुरू ने कहा था कि किसी भी वस्तु में आसक्त मत होना मगर तुम इतनी जल्दी इस आश्रम और जमीन के बंधन में उलझने को तैयार हों गये। स्वामी राम बहुत लज्जित हुए और वहां से चले गए।
अब आगे वे एक और संत के पास गये। जो एक झरने के पास रहते थे। जहाँ लोग हाथ मुँह धोने और नहाने आया करते थे। स्वामी जी जब झरने के पास से गुजर रहे थे तो उन्होंने वहाँ कुछ सोने के सिक्के पड़े देखे स्वामी जी ने उन्हें उठा लिया और अपनी लंगोटी में रख लिया मगर अगले ही क्षण यह सोचते हुए वापस वहीं रख दिए कि यह मेरे तो नहीं है और फिर मुझे इनकी आवश्यकता भी तो नहीं फिर मैं क्यों इन्हें अपने पास रखूं। और वे सिक्के वहीं रखकर आगे बढ़ गए। मगर जब वे उन संत के पास पहुंचे तो वे बहुत क्रोधित थे। स्वामी जी ने उन्हें प्रणाम किया किन्तु वे बोले तुमने उन सिक्कों को क्यों उठाया। तुम अभी भी धन और संपत्ति के लोभी हो। चले जाओ यहां से। इस पर स्वामी जी ने कहा परन्तु मेंने उन्हें वापस रख भी तो दिया लेकिन संत नहीं माने उन्होंने कहा कि तुमने उन्हें उठाया ही क्यों? स्वामी राम लौट गए। 
इन संतों से मिलकर स्वामी राम को ज्ञात हुआ कि पुस्तकीय ज्ञान और अनुभावात्मक (भावात्मक नहीं अनुभावात्मक) ज्ञान में क्या अन्तर है। वापस लौटने पर गुरूदेव ने पूछा कि तुम क्या सीखकर आए? 
इस पर स्वामी राम ने कहा कि इतना सब घूमने के बाद मुझे समझ आया कि मेरे पास बौद्धिक ज्ञान तो है किन्तु मैं उस ज्ञान के अनुसार आचरण नहीं करता हूँ। 

तब गुरुदेव ने कहा कि यहीं समस्या अधिकांश बुद्धिजीवी लोगों के साथ हैं। उनके पास ज्ञान तो बहुत होता है लेकिन वो उस ज्ञान का अपने जीवन में प्रयोग नहीं कर पाते और इसके विपरित उनका अहंकार बढ़ जाता है। मनुष्य जानता तो बहुत कुछ है किन्तु, उसका वह ज्ञान उसके दैनिक जीवन में आचरित नहीं हो पाता। यदि उस ज्ञान को व्यावहारिक जीवन में न लाया जाए तो वह ज्ञान सिर्फ बोझ होता है। सच्चा ज्ञान वहीं है जो हमे मुक्ति दे। जिससे हमारा शुद्धिकरण हो, हमारे जीवन का विकास हो और हम अपनी आत्मा की गहराईयों में बैठकर अपने आप को जान सकें।

इस कहानी का तात्पर्य यह है कि किताबी ज्ञान प्राप्त करने से आप ज्ञानी नहीं हो जाते हैं। उस ज्ञान का आत्मचिंतन करने उसका मनन करने उसको अपने व्यवहारिक जीवन में लागू करने पर ही आप ज्ञान प्राप्ति की ओर अग्रसर हो सकते हैं। 

 

Comments

mostly read

2022?? 15 लाख! बुलेट ट्रेन! मल्टीनैशनल कंपनियां! विश्वगुरु! और जाने क्या-क्या??

धर्म को लेकर क्या थे कार्ल मार्क्स के विचार?

इंदिरा गाँधी के पति फिरोज़ गाँधी या खान का जीवन ?

क्या है CAB और NRC?

क्यों गए थे गाँधी जी दक्षिण अफ्रीका?